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man apane ko pahichaan…

आगरा(arohanlive.com) महान विचारक, साहित्यकार, कवि एवं लेखक श्री विश्वेश्वर दयाल अग्रवाल की रचना- मन अपने को पहिचान में मन की चंचलता और उसे पहचानने के बारे में बड़े ही सजीव शब्दों में व्यक्त किया है।

मन अपने को पहिचान… 

(श्री विश्वेश्वर दयाल अग्रवाल)

 

मन अपने को पहिचान,

कौन है तू, कहां से आया,

कौन है तेरा गांव,

पल-पल रंग बदलता क्यूं है,

कभी बनता है देव,

कभी बन जाता है हैवान।

बहता रहता है तू धारा की भांति,

कभी न रहता एक समान,

क्यूं दुविधा-चंचलता में रहता,

क्या तेरा नहीं कोई धाम,

क्यों भटकता है इस जग में,

बार-बार जीता-मरता है,

फिर भी प्यासा का प्यासा रहता है,

क्या नहीं तुझे आत्मा का ज्ञान।

चुप हो गया मन, कुछ न बोला,

बहुत देर बाद अंदर से आवाज आई,

तू पुत्र है अमृत का…

तू अमर अविनाशी है,

आत्मा को पहचान,

तू अनन्त है, तू है सर्वव्यापी,

तू साझी है विश्व का,

तू निर्माता, इस विश्व चित्र का,

तू भोक्ता है इस सृष्टि का,

अपने आदर्श को पहचान,

आत्मा में कर विश्राम।

मन अपने को पहिचान।

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